विश्वविद्यालय के बारे में :: कुलाधिपति (श्री. ज़फ़र सरेशवाला)

श्री. फ़िरोज़ बख़्त अहमद,
कुलाधिपति,
मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी,
हैदराबाद

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श्री फ़िरोज़ बख़्त अहमद, माननीय कुलाधिपति, मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी(मानू), एक शिक्षाविद के साथ ही सह-स्तंभकार/ लेखक, सामाजिक कार्यकर्ता और भारत रत्न एवं भारत के पहले शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के भतीजे हैं। ये उन हस्ताक्षरकर्ताओं में से एक रहे हैं, जिन्होंने 1997 में मौलाना आजाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी के मसौदे का जोरदार समर्थन किया था। दिलचस्प बात यह है, कि वह अब इस प्रतिष्ठित ज्ञानार्जन मंदिर के पांचवें कुलाधिपति बन गए हैं। श्री अहमद, दिल्ली विश्वविद्यालय के एक भूतपूर्व छात्र एवं एक खेल उत्साही रहे, इन्होने अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा, इटली, पोलैंड इत्यादि का दौरा कर शिक्षा और शासन पर अनेक सम्मेलनों में भारत का प्रतिनिधित्व किया।

उनके जीवन का आदर्श मौलाना अबुल कलाम आज़ाद के पद चिन्हों पर चलना है, जिनका दृष्टिकोण भारत को जीवन के सभी क्षेत्रों में शीर्ष स्तर पर देखना था। आज़ाद के जीवन की प्रमुख चिंता जीवन के सभी क्षेत्रों में भारतीय मुसलमानों के पुनरुत्थान और सुधार की थी, और उनके लिए इसी संदर्भ में उनकी राजनीतिक आशाएं थीं।इसके अलावा, हिंदुओं और मुस्लिमों के सांप्रदायिक समन्वय उनके दिल के मूल में थी और इसी तरह की भावना उनके भतीजे के शब्दों और भाषणों में दिखाई देती है।

अपने बड़े चाचा मौलाना साब की तरह, श्री बख्त उर्दू माध्यमिक विद्यालयों और मदरसों की शिक्षा के उत्थान के लिए अपना समय बिता रहे हैं। वह धर्म को हटाकर, धर्मनिरपेक्ष शिक्षा जोड़कर मदरसा का आधुनिकीकरण करना चाहते है।

श्री बख़्त को उच्च स्तरीय समिति के सदस्य के रूप में उत्कृष्टता के पांच संस्थानों और पिछड़े अल्पसंख्यक क्षेत्रों में 100 स्कूलों की स्थापना के लिए नियुक्त किया गया था। इस समिति की सिफारिशों के अनुसार, देश के विभिन्न हिस्सों में काम शुरू हो चुका है। श्री बख़्त भारत और विदेशों के कई मुख्य समाचार पत्रों के लिए त्रिभाषी (उर्दू, हिंदी और अंग्रेज़ी) स्तंभकार भी हैं। इन्होंने सांप्रदायिक सद्भाव, सुशासन, शिक्षा, उर्दू माध्यमिक विद्यालयों, मदरसा, प्रतिष्ठित व्यक्तित्वों के साक्षात्कारो और यहां तक कि खेल (उनके जुनून) सहित विभिन्न विषयों पर हजारों लेख लिखे हैं।

श्री फ़िरोज़ बख़्त एक कर्मठ कार्यकर्ता भी रहे हैं, वास्तव में एक स्मारक उद्धारकर्ता, जिन्होंने गालिब की हवेली (निवासस्थान), एंग्लो अरबी स्कूल, मौलाना आज़ाद के मकबरे, सुफी संत हज़रत निज़ामुद्दीन औलिया के दरगाह (पवित्र स्थान), कॉमी स्कूल, जामा मस्जिद की पुरानी संस्कृति, सम्राट बहादुरशाह ज़फ़र के शिक्षक ज़ौक के मकबरें, सहित विभिन्न स्मारकों की रक्षा की है।

उर्दू के साथ-साथ हिन्दी में बच्चों के साहित्य के क्षेत्र में श्री अहमद की सेवाएं जानी जाती हैं। इन्होंने उर्दू में पांच पुस्तकें लिखी है : (1) उर्दू तालीम और स्कूल (2) अबुल कलाम आज़ाद : चंद शख्सी पहलू (3) नेकी का इनाम और (4) माजिद की अक्लमंदी और (5) हंसों और हंसाओं : बच्चों के लतीफे। इन्होंने मौलाना आज़ाद पर एक पुस्तक लिखी जिसका नाम है ," अबुल कलाम आज़ाद :चंद शख्सी पहलू " जोकि एन.बी.टी. द्वारा प्रकाशित की गई। इनकी एक अन्य पुस्तक दिल्ली के स्मारकों के एन्विल पर है। अभी हिन्दी में मौलाना आज़ाद पर एक पुस्तक छपने के लिए तैयार हैं।

श्री बख़्त ने स्मारकों के पूर्वावस्था और भारतीय मुस्लिम के संमुखीन शिक्षा , जेहाद के स्पष्टीकरण, काफ़ीर, ट्रिपल तलाक, मुस्लिमों में परिवार नियोजन, भारत माता की जय, मदरसा, सामान्य नागरिक कोड, आतंकवाद आदि विषयों से संबंधित विवादों के संकल्प के संबंध में अनेकों टेलीविजन तर्क-वितर्क के कार्यक्रमों में भाग लिया, और सकारात्मक एवं राष्ट्रवादी दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। इनका कीर्तिमान यह है कि ये एक महत्वाकांक्षी व्यक्ति और चीज़ों को तेज़ी से एवं व्यावहारिक रूप से करने में विश्वास करते है। श्री बख़्त मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी को अपनी दूरदर्शिता से वास्तविक वैभव की ऊंचाईयों पर ले जाना चाहते है।


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